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मध्यवर्ग : एक उम्मीद

मध्यवर्ग

मध्यवर्ग के समाज को देखकर यह लगता है की वर्त्तमान मे यह गहरे असमंजस मे है | कोरोना काल मे इस पर गहरी मार पड़ी है | इस पीड़ा को मनोविज्ञानिक स्तर, आर्थिक स्तर और सांस्कृतिक स्तर पर समझा जा सकता है |
मनोवैज्ञानिक स्तर लॉकडाउन की  अवधि से इनमे कई तनाव और अवसाद के संकेत मिलने लगे है | बच्चो का स्कूल ना जा पाना भी मध्यवर्गीय समाज के लिए चिंता का कारण है | ऑनलाइन शिक्षा भी माता पिता के गले नही उतर रही है |  लॉकडाउन की लम्बी अवधि से बच्चो मे आक्रामकता, चिड़चिड़ापान बढ़ने  लगा है | आर्थिक स्तर पर कोरोना के दौर मे एक तरफ पे- बिल कम हुए है वही दूसरी तरफ करीब 11करोड़ मध्यवर्गीय समाज से जुड़े लोगो के रोज़गार भी छीन गए  है | पेंशन और रोज़गार छीनने से यह मध्यवर्गीय समाज आहात है किन्तु बदलती परिस्थितियों मे यह समाज धीरे धीरे ढलने की  कोशिश  कर  रहा  है |  उम्मीद है  मध्यवर्ग  फिर से आर्थिक तेजी पकड़ेगा | सरकारो को इस अवधि मे सहायतार्थ, सरल कानून और छूटे देनी चाहिए |
सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चो पर भी चोट पड़ी है | भारत मे महिलाएं वर्षा ऋतु मे उत्सव मानती है किन्तु कोरोनाकाल मे समूह उत्सवो पर पाबन्दी है | मंदिर भी बंद है | होटल,  रेस्टोरेंट और ढाबे बंद होने से इस वर्ग की कहानी अधूरी अधूरी सी लगती है |

मध्यवर्ग हमारी अर्थव्यवस्था की तागत के मूल मे है | यह टैक्सपेयर के रूप मे अर्थव्यवस्था मे अपना भारी योगदान देता है | सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन के विविध आयामो को अपनी सक्रियता से बल देता है | कॉरोनकाल मे इस वर्ग पर गहरे तनाव और दबाब के चिन्ह दैखने को मिले है | आशा की जानी चाहिए की यह दौर भी निपटेगा और मध्यवर्ग फिर गति पकड़ेगा |