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होस्टाइल गवाह, न्याय सिफर

होस्टाइल गवाह

विकास दुबे की मौत से एक प्रश्न समाज मे और तैरने लगा है की 60 मुकदमे का यह अपराधी लगातार जमानत और जेल से बाहर कैसे आता रहा| इस सम्बन्ध मे कहा जाता है की उसके खिलाफ गवाहों ने न्यायालयो मे पलटी मार दी| यहाँ तक की उत्तरप्रदेश के एक राज्य मंत्री संतोष शुक्ला की दिन दहाड़े हत्या दरोगा के सामने कर दी गई और बाद मे सारे गवाह मुकर गए| 

हमारे न्यायालयो मे साक्ष अधिनियम लागू होता है| देखा यह गया है कि बाहुबली या गंभीर तरीके के अपराधी गवाहो को डरा धमका कर, प्रलोभन देकर या गवाहों को समाप्त करके केस को इतना कमजोर कर देते है कि वे न्यायालय मे टिक नही पाते है| इससे न्याय का तराज़ू अपराधी के और ही झुक जाता है| आज जरूरत इस बात की है कि पलते वे गवाहों पर कानूनन कठोरता की जाये|
गवाहों को होस्टाइल करने मे वकीलों की भी बहुत बड़ी भूमिका है| उन्हे समझना चाहिए की होस्टाइल गवाहों और गिरते हुए न्यायतंत्र मे अंतिम नुक्सान उन्ही का होगा| जिम्मेदार वकील का भी यह दाइत्व है की अपराधी को न्याय के कटघरे मे खड़ा किया जाये| तारीख पे तारीख लेने का मनोविज्ञान भी इधर बहुत तेजी से बड़ा है| इससे भी आपराधिक न्याय व्यवस्था कमजोर पडती है|
सुप्रीम कोर्ट ने वादकारियो  के हित मे कई फैसले दिए है| स्थिति मे तत्काल सुधार की जरूरत है अन्यथा विकास दुबे की तरह सडक पर न्याय इस व्यवस्था को बहुत भारी पड़ेगा|