उत्तराखंड में अगले साल हरिद्वार में होने वाले अर्द्धकुंभ से पहले गंगा नदी की स्वच्छता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत 37 परियोजनाएं पूरी होने से गंगा अब ‘अप्रदूषित’ श्रेणी में आ गई है।
देवभूमि उत्तराखंड में अगले साल हरिद्वार में होने वाले अर्द्धकुंभ से पहले राष्ट्रीय नदी गंगा की स्वच्छता एवं निर्मलता के दृष्टिगत अच्छी खबर आई है। राज्य में संचालित केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी नमामि गंगे कार्यक्रम के फलस्वरूप अविरल और निर्मल गंगा का संकल्प अब जीन पर दिखने लगा है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में गंगा अब अप्रदूषित श्रेणी में शामिल हो गई है। नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत 37 परियोजनाएं पूर्ण होने के साथ ही सीवेज शोधन क्षमता में 10 गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्ष 2014 से पहले यह क्षमता महज 18 एमएलडी थी, जो अब 200 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) तक पहुंच गई है। इसका असर अगले वर्ष होने वाले कुंभ में भी दिखाई देगा, जब श्रद्धालु पहले से कहीं अधिक स्वच्छ गंगा में आस्था की डुबकी लगाएंगे।
जीवनदायिनी नदी गंगा उत्तराखंड हिमालय से निकलकर देश के विभिन्न राज्यों से होते हुए गंगासागर में मिलती है। केंद्र सरकार ने जब गंगा की स्वच्छता और निर्मलता को लेकर नमामि गंगे कार्यक्रम प्रारंभ किया तो स्वाभाविक रूप से उत्तराखंड को इसमें शामिल किया गया।
पहले चरण में गंगा के उद्गम गोमुख से लेकर हरिद्वार तक के नगरीय क्षेत्रों में नमामि गंगे के तहत सीवेज शोधन संयंत्र स्थापित करने के साथ ही गंगा में गिर रहे गंदे नालों की टैपिंग पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसके सार्थक नतीजे अब दिखने लगे हैं।
तकनीक और इन्फ्रास्ट्रक्चर का अनूठा संगम
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के डीडीजी नलिन कुमार श्रीवास्तव के अनुसार उत्तराखंड में नमामि गंगे के अंतर्गत अब तक 37 परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं। इसके फलस्वरूप 200 एमएलडी क्षमता वाले 50 सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) स्थापित हुए हैं। इसने गंगा में बिना उपचारित अपशिष्ट जल के प्रवाह को रोकने में अहम भूमिका निभाई है।
एसटीपी की रियल टाइम निगरानी को ‘गंगा पल्स पोर्टल’ जैसा डिजिटल नवाचार भी किया गया है। यह पोर्टल जवाबदेही भी तय करता है। इसके अलावा गंगा में गिरने वाले 170 में से 155 नालों को टैप कर किया जा चुका है, जबकि शेष की टैपिंग को कार्य चल रहा है।
मैदानी स्तर पर निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए ‘ड्रेन डैशबोर्ड’ टूल प्रभावी सिद्ध हो रहा है। यह नदी में गिरने वाले नालों की पल-पल की ट्रैकिंग करता है। इसमें नालों की टैपिंग स्थिति और सीवेज को एसटीपी तक मोड़ने की प्रक्रिया की लाइव मानीटरिंग की सुविधा है। यह वास्तविक समय में प्रदूषण जोखिम की पहचान कर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है, जिससे व्यवस्था में पारदर्शिता आई है।
पहाड़ी भूगोल के लिए सटीक रणनीति
भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए यहां ”इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन” दृष्टिकोण अपनाया गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक सीवेज नेटवर्क बिछाना चुनौतीपूर्ण है, इसलिए खुले नालों के पानी को नदी में गिरने से पहले ही ”इंटरसेप्ट” कर शोधन के लिए मोड़ दिया जाता है। यह तकनीक प्रदूषण के भार को नदी के मुहाने पर ही समाप्त कर देती है।
सुधर रही गंगा की सेहत
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की जल गुणवत्ता रिपोर्ट-2025 के अनुसार उत्तराखंड में गंगा अब ‘अप्रदूषित’ श्रेणी में है। बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) का स्तर 3 एमजी/लीटर से कम है, जो एक स्वस्थ नदी का मानक है। वहीं, घुलित आक्सीजन (डीओ) का स्तर भी जलीय जीवन के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाया गया है। जैविक आकलन के अनुसार जल की गुणवत्ता “बहुत अच्छी” से “अच्छी” श्रेणी के बीच बनी हुई है।
