विचार: सवालों के घेरे में राहुल की नेतृत्व क्षमता

बीएमसी का चुनाव भी कांग्रेस के लिए बहुत जोर-आजमाइश का था, लेकिन राहुल उसमें भी दमखम नहीं दिखा पाए। स्वाभाविक ही था कि परिणाम कांग्रेस के प्रतिकूल रहे। पार्टी 227 सीटों में केवल 9.31 प्रतिशत वोटों के साथ मात्र 24 सीटें ही जीत पाई। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए यह निराशाजनक है।

कांग्रेस में राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर सवालों का सिलसिला जोर पकड़ रहा है। बीते दिनों कुछ मुस्लिम नेताओं ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोला है। निश्चित रूप से यह उनकी पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं, जो अपने वजूद के लिए एक बड़ी हद तक मुस्लिम मतदाताओं पर निर्भर है। स्वतंत्रता के बाद से ही मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ रखने वाली कांग्रेस से अगर मुस्लिमों का ही मोहभंग हो रहा है तो यह उसके लिए बड़े खतरे की घंटी है। राहुल की नेतृत्व क्षमताओं पर सवाल उठाने वालों में एक नाम पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे डा. शकील अहमद का है। बिहार के पारंपरिक कांग्रेसी परिवार से आने वाले शकील अहमद कई बार विधायक, सांसद और मंत्री भी रहे हैं। उन्होंने राहुल पर आरोप लगाया कि वे ‘डरपोक’ हैं।

उन्हें वरिष्ठ नेताओं के साथ काम करने में असहजता होती है, क्योंकि उन्हें ‘आप’ कहकर संबोधित करना पड़ता है। यह उन्हें रास नहीं आता। अहमद ने राहुल को अहंकारी, विशेषाधिकारों से ग्रस्त और असुरक्षित भी बताया है। अहमद का कहना है कि उन्होंने राहुल से अधिक असुरक्षित नेता देखा ही नहीं। वे वोट चोरी जैसे मुद्दे उठाकर परिदृश्य से गायब हो जाते हैं। मल्लिकार्जुन खरगे को कठपुतली अध्यक्ष बताते हुए अहमद ने कहा कि पार्टी के सभी बड़े निर्णय राहुल गांधी ही लेते हैं। अहमद ने यहां तक कहा कि शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी कार्यकर्ताओं को उनके पटना और मधुबनी स्थित आवास पर हमले का निर्देश भी दिया।

एक और अनुभवी एवं वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी भी पार्टी आलाकमान से असंतुष्ट हैं। अल्वी का कहना है कि कि पार्टी में आंतरिक संवाद के लिए कोई जगह नहीं और यहां तक कि वरिष्ठ नेताओं के लिए भी शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच टेढ़ी खीर है। जबकि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे दिग्गजों के समय में भी पार्टी कार्यकर्ताओं को उनसे समय मिलने में समस्या नहीं होती थी। अल्वी के अनुसार उन्हें यह देखकर दुख होता है कि कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक का उपयोग तो करती है, लेकिन मुसलमानों की परवाह नहीं करती। पार्टी की नीतियों से कोई संकेत नहीं मिलता कि मुस्लिमों के जीवन की दशा-दिशा सुधारने की उसकी कोई मंशा है। पार्टी से निराश मुस्लिम नेताओं में एक नाम नसीमुद्दीन सिद्दीकी का भी है। जमीन से जुड़ाव रखने वाले सिद्दीकी बसपा के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे। बसपा से किनारा कर कांग्रेस से जुड़ने वाले सिद्दीकी का भी पार्टी से मोहभंग हो गया। उनका कहना है कि व्यापक जनाधार के बावजूद कांग्रेस उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दे रही थी और अनदेखी के कारण उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी।

देखा जाए तो केवल मुस्लिम नेता ही नहीं, बल्कि अन्य वरिष्ठ नेता भी पार्टी में अपनी अनदेखी से क्षुब्ध नजर आ रहे हैं। ऐसे ही एक नेता शशि थरूर हैं। देश-विदेश में अपनी विद्वता से खास पहचान बनाने वाले थरूर किसी भी पार्टी के लिए बहुत उपयोगिता रखते हैं, लेकिन उन्हें अपने ही दल में उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। उनकी उपेक्षा शकील अहमद के उन आरोपों को ही पुष्ट करती है कि पार्टी में सक्षम लोगों को किनारे किया जाता है। संभव है कि थरूर से आलाकमान की नाराजगी अध्यक्ष पद के लिए अपने प्रत्याशी खरगे के खिलाफ चुनाव लड़ने से लेकर आपरेशन सिंदूर के दौरान सरकारी दृष्टिकोण से सहमति जताने के कारण भी हो सकती है। जबकि आपरेशन सिंदूर में थरूर ने वही रुख अपनाया था, जो कोई भी सच्चा भारतीय अपनाता।

आत्ममंथन का आह्वान करने वाले ऐसे नेताओं की बातों पर कान देने के बजाय पार्टी आलाकमान के करीबी उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल देते हैं। एक पार्टी सांसद ने इन नेताओं को “2026 बैच के जयचंद” कहा है। इसका अर्थ है कि वे धोखेबाजों का समूह हैं। इसी क्रम में शकील अहमद और राशिद अल्वी जैसे नेताओं को असफल और निराश बताया गया है, जो राहुल गांधी जैसे सक्षम नेताओं के प्रति सहिष्णु नहीं। शीर्ष नेतृत्व के करीबी पलटवार करते हैं कि पार्टी द्वारा भिन्न-भिन्न स्वरूप में उपकृत होने के बावजूद ये विश्वासघात पर आमादा हैं। हालांकि पार्टी में एक वर्ग इस घटनाक्रम को लेकर गंभीर भी है। ऐसे नेता स्वीकार करते हैं कि पार्टी का जनाधार उतार पर है, लेकिन उनके सामने भी बड़ा सवाल यही है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

बिहार विधानसभा चुनाव और हाल के बीएमसी चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी में कमजोरियों को लेकर बातें हो रही हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 8.71 प्रतिशत वोट मिले और वह छह सीटें ही जीत पाई। पार्टी का प्रदर्शन इतना लचर रहा कि उसके गठबंधन सहयोगी भी हार का ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ने लगे। सीटों की साझेदारी के समय भी महागठबंधन नेता यही कह रहे थे कि उनकी सबसे कमजोर कड़ी कांग्रेस है और यह बात चुनाव नतीजों से एकदम पुष्ट भी हुई। पार्टी के पास न तो कार्यकर्ता थे और न ही वोट-बेस। इसके बावजूद राहुल गांधी ने कड़ी सौदेबाजी के लिए पूरी जान झोंक दी।

कांग्रेस ने जहां अधिक से अधिक सीटें लड़ने के लिए पूरा जोर लगाया, वहीं प्रचार अभियान के दौरान वह निस्तेज पड़ गई। परिणाम यह रहा कि महागठबंधन के चुनाव अभियान का पूरा दारोमदार तेजस्वी को उठाना पड़ा। चुनावी दुंदुभि बजने से पहले तो राहुल गांधी ने आक्रामकता दिखाई, लेकिन महागठबंधन का चुनावी घोषणा पत्र जारी होने के मौके पर भी नदारद रहे। आखिर में उन्होंने कुछ रैलियां जरूर कीं, लेकिन तब तक चुनावों की दिशा तय हो चुकी थी।

बीएमसी का चुनाव भी कांग्रेस के लिए बहुत जोर-आजमाइश का था, लेकिन राहुल उसमें भी दमखम नहीं दिखा पाए। स्वाभाविक ही था कि परिणाम कांग्रेस के प्रतिकूल रहे। पार्टी 227 सीटों में केवल 9.31 प्रतिशत वोटों के साथ मात्र 24 सीटें ही जीत पाई। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए यह निराशाजनक है। अब जब तमिलनाडु, केरल, बंगाल, असम और पुडुचेरी के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, तब कांग्रेस नेताओं की धुकधुकी और बढ़ ही रही होगी कि क्या उन्हें राहुल के नेतृत्व से मुक्ति मिल पाएगी या नहीं?

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