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Admissions: पड़ाव नहीं गंतव्य है

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Admissions

दिल्ली विश्वविद्यालय मे प्रवेश हर वर्ष की एक चुनौती पूर्ण घटना है| देश के विभिन्न शिक्षा बोर्डो से दिल्ली विश्वविद्यालय मे प्रवेश चाहने के लिए लाखो छात्र आवेदन करते है किन्तु एडमिशन 90 से 100 प्रतिशत अंक लाने वालो के ही अधिकांशतया हो पाते है| अवशेष बच्चे फिर अपने शेहरो के आस पास एडमिशन की जद्दोजहद मे खो जाते है|

दिल्ली विश्वविद्यालय मे करीब 154 कॉलेज आते है|छात्रों का पुरुषार्थ और ज़द्दोज़हत इन्ही विद्यालयों मे प्रवेश की जुगत से निकलती है|दिल्ली विश्वविद्यालय के अतरिक्त एक सेंटर फॉर ओपन लर्निंग , राज्य सरकार के विश्वविद्यालय और अन्य संस्थाएं भी है| ओपन लर्निंग के साथ साथ पुरे भारत के छात्रों के लिए इग्नू भी यही पर स्थित है|प्रवेश की आपाधापी और मारामारी मे दिल्ली विश्वविद्यालय सबसे आगे है किन्तु यही दिल्ली विश्वविद्यालय ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग मे कही नही ठहरता है| कारण स्पष्ट है सेकेंडरी लेवल तक रटने के संस्कार को महत्त्व मिलता है और विश्वविद्यालय लेवल पर आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर के आभाव मे जर्ज़र होती शिक्षा|

यह जर्ज़र शिक्षा ग्लोबली प्रतिस्पर्धात्मक छात्रो को तैयार नही कर सकती|इन छात्रों मे विश्व स्तरीय स्किल्स को टटोलना टेड़ी खीर है|इनोवेशन की भावना भी सिरे से गायब है|जरूरी है की एडमिशन की आपाधापी और मारामारी के बजाय बदलती वैश्विक चुनोतियो और सम्भावनाओ के सापेक्ष लचीली शिक्षा नीतियाँ तैयार की जाये| प्रत्येक विश्वविद्यालय अथवा दिल्ली केंद्रीय विश्विद्यालय सभी को इनोवेटिव मोड पर लाया जाना चाहिए |छात्रों मे प्रतियोगिता और पुरुषार्थ की कमी कही नही है|जरूरत है समर्थ विश्वविधालयों और समर्थ शिक्षा नीति की| स्वतंत्र शिक्षा संस्कारो मे पढ़ी-बढ़ी पीडी देश के लिए आर्थिक और सामाजिक एसेट हो सकती है|

इस मानव संसाधन को राष्ट्रीय जीडीपी का हिस्सा बनाना ही होगा| एडमिशन से आगे एक मानव जनशक्ति विकास का प्रकल्प तैयार करना होगा| इस प्रकल्प मे ना केवल भौतिक लाभ हानि का गणित होगा बल्कि भावनात्मक स्तर पर ‘ सा विद्या या विमुक्ते ‘ के मानसिक और संवेदनाओ के गुना भाग को भी समझने की ज़रुरत है| युवाओं के इन विश्वविद्यालयों मे पड़ने के साथ ही पुरुषार्थ और ज़िंदगीनामा की एक नयी इबारत लिखने की ज़रुरत है| एडमिशन पड़ाव नही एक गंतव्य है इसे सभी छात्रों को याद रखना चाहिए|