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गुरुपूर्णिमा – नये और पुराने लोकजीवन के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु

गुरुपूर्णिमा

आज बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सभी को सुभकामनाये और बधाई |
कोरोना काल मे यधपि आश्रमो, शिक्षण संस्थानो व मंदिरो मे भीड़ भाड़ कम है लेकिन देवशयनी एकादशी के बाद यह भारत का पहला सांस्कृतिक पर्व है |
गुरु पूर्णिमा गुरुसत्ता के प्रति नमन का दिवस है लेकिन इसके बहुआयामी निहितार्थ है | सांस्कृतिक चेतना मे यह बरसात शुरू होने के साथ प्रकृति पर्व है | प्रकृति मे हरियाली की छठा मनमोहक है | धार्मिक दृष्टि से गुरुसत्ता के प्रति नमन व समर्पण से
नया जीवन, नयी उमंग और नया मार्गदर्शन मिलता है |
इसमे गुरुशिष्य परंपरा की भी झलक मिलती है | प्राचीन भारत मे शिष्य आश्रम मे रहते थे | गुरुसेवा करते करते प्रारंभिक वर्षो मे अपने लोक जीवन के लिए आवश्यक कौशल और सभी विधाएँ सीखते थे |

नव उदारवादी दौर मे इस परंपरा और दर्शन को गहरा धक्का लगा है |
आश्रम कॉर्पोरेट हाउस बनने की और है | गुरु भोगवादी और उदारवादी दौर मे धन संचय की और है | बड़ी बड़ी गाड़िया और दिखावे के निकट है | चारो और बदलाव की हवा बह रही है
| गुरु भी इससे अछूते नहीं है | धन्नासेठ अब गुरु के नितांत नजदीक है | कही कही बाहुबली, नेता और अभिनेता तक शिष्य के रूप मे देखे जाते है |

हमे भारत की इस गुरुपर्व की महिमा को नये सिरे से समझना होगा | गुरु नये विचारों और परम्पराओ का संवाहक हो सकता है किन्तु इसके लिए भोगवाद को सिमित करना जरूरी है | यह श्रद्धा पर्व है | मेरे आस्था गुरु को सर्वोत्तम, ज्ञानवान और चरित्रवान होना चाहिए | इसी कामना के साथ एक बार फिर गुरु पूर्णिमा की ढेर सारी सुभकामनाये |

लेखक – विजय कुमार