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RAKHI FESTIVAL : भाई बहन के प्यार से पर्यावरण प्रेम तक (an incredible initiative 4 environmental power)

RAKHI FESTIVAL भारत का एक अद्वितीय पर्व है|बहन भाई के रिश्ते को सदियों से परिभाषित करने वाला यह त्यौहार ना केवल अनूठा है बल्कि मुगल बादशाहो को हिन्दू वीर नारियो के द्वारा राखी बांधने का भी प्रतीक रहा है|भारतीय संस्कृति मे ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमान को रखी बांधने व यज्ञोपवीत देने की भी परंपरा रही है|लेकिन लोकल परम्पराए अब विलुप्ति की कगार पर है| जरूरत है – Vocal for local होने की|

RAKHI FESTIVAL बहन भाई के प्रेममये ऊर्जा का त्यौहार है|मार्केटिंग के दौर मे सोशल मीडिया ने भी राखी के प्रचार प्रसार मे कोई कसर नहीं छोड़ी है| कोरोना के दौर मे और बढ़ते बाज़ारवाद के कारण रखी के सन्दर्भ और नैरेटिव मे काफी परिवर्तन देखे जा सकते है| फिल्मो मे भी भाई बहन के इस प्यार को समय समय पर मार्मिक रूप से चित्रित किया गया है|

RAKHI FESTIVAL ROLE IN ENVIRONMENT CONSERVATION

उत्तराखंड मे सातवे दशक मे राखी की एक नयी परिघटना हुई| गौरादेवी और चंडी प्रसाद भट्ट जैसे कुछ पर्यावरण प्रेमियों ने वृक्षों को राखी बांधने की अनूठी पहल शुरू की| इसका परिणाम चमोली जिले मे चिपको आंदोलन की शुरुवात थी| बाद मे इस आंदोलन की रणनीति से अनेक पेड़ो को पातन से बचाया गया|स्थानीय वन माफिया जिन पेड़ो को काटना चाहते थे उन्हें राखी बाँधी गयी और स्थानीय वृक्षों पर पहाड़ी नर नारिया लिपट गये|

वन माफिया जंगल से लौट गये और इतिहास के दस्तावेज मे चिपको आंदोलन रक्तहीन क्रांति के रूप मे दर्ज हो गया|बाद मे इसी तरह के जन आंदोलन देश के अनेक भागों में भी संपन्न हुए|इसी तरह जल संरक्षण हेतु गॉव घरों के पुराने तालाबों, नौले- धारो को भी राखी बांधकर उनके पुनरुउद्धार का विचार किया जा सकता है|

आज मार्केटिंग एवं उपभोगतावादी समाज मे महंगी राखिया साधारण रक्षा सूत्र व राखियों का स्थान लेने लगी है| घर परिवार मे पकवानो की प्राकृति भी काफी बदल गयी है| क्या यह अच्छा नहीं होगा की राखी के रक्षासूत्र हर घर मे होने वाली तुलसी व अन्य पौधों के पल्लवों से तैयार किये जाये|साथ ही यह हिदायत बच्चों को दी जाये ताकि वे पौधों से अपनापन बड़ा सके|

यह पर्यावरण चेतना यदि संस्कार मे बदल सके तो हर परिवार मे आरोग्य की नयी नीव रखी जा सकती है|लेखक ने अपने घर मे तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और नवग्रह से संभंधित पौधों को रक्षा सूत्र बांधने का निश्चय किया है|कोरोना के इस दौर मे इतना भर करने से हम आरोग्य की और बढ़ेंगे|

प्रजापिता ब्रह्ममकुमारी ईश्वरीय विश्वविधालय की कुछ बहिने प्रतिवर्ष राखी के दिन सचिवालय आती थी| राखी बांधकर व दक्षिणा मे एक बुरी आदत छोड़ने का आग्रह करती थी| उनके इस आग्रह मे गहरी आत्मीयता झलकती थी|बार बार चाय छोड़ने की बात कहकर मे कभी चाय नहीं छोड़ पाया| लेकिन रिटायरमेंट के बाद उनकी मौन उपस्थिति रह रह कर उनकी याद दिलाती है|

राखी या कोई अन्य त्यौहार समय समय पर अपना रूप रंग बदलते रहते है| बदलाव के नये नये नैरेटिव के बाद भी यह त्यौहार सामाजिक ऊर्जा और सोशल फैब्रिक के ताने बाने को एक रखते है| तमाम बुजुर्ग पीढ़ियों के गुज़र जाने के बाद भी इस दिन नयी पीढ़ी को पौधों को राखी बांधने का संस्कार देना चाहिए|

स्कूलों, कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा योजना और NCC के माध्यम से वृक्ष बंधन के महापर्व आयोजित किये जाने चाहिए| 50 से 100 वर्ष तक के पुराने पेड़ों को राखी बांध कर हम उनके प्रति भी अपना सम्मान वह प्यार जता सकते हैं|साफ हवा मानव जाती का आधार है और पेड़ इसके ख़ज़ाने है|

आज के मानव को वृक्ष बंधन को राखी के बहाने अपनी जीवन शैली का अंग बनाना होगा|  गांव, शेहर, कस्बे सवत्र राखी की खुसबू बिखरनी चाहिए इसी मंगल कामना के साथ सभी को ‘राखड़ी’ की हार्दिक शुभकामनाए |