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 आत्मनिर्भर भारत मे संस्कृति की भूमिका

आत्मनिर्भर भारत मे संस्कृति की भूमिका

लॉकडाउन के दौरान भारत में दूरदर्शन व अन्य माध्यमों ने भारत की परंपरागत संस्कृति को पुनः जागृत किया है | परंपरागत सीरियल्स जैसे रामायण, महाभारत,  जय श्री कृष्णा आदि ने दर्शकों की खूब ताली बटोरी| सालों पहले का उत्साह एक नए कलेवर में लोगों के सामने परोसा गया|भारत के आत्मनिर्भर अभियान को इससे पर्याप्त बल मिल सकता है| मेरा विचार है कि लोकल टू ग्लोबल की अवधारणा को संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रीयऊर्जा पैदा करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है| संस्कृति मे किसी राष्ट्र की प्राणप्रतिष्ठा खोजी जा सकती है| वहा का गीत, संगीत, लोकजीवन, रहनसहन, हेंडीक्राफ्ट आदि मे ऊर्जा और मुद्रा कमाने के तमाम प्रयोग किये जा सकते है| आत्मनिर्भर भारत संस्कृति की इस इबारत को नये सिरे से लिख सकता है| 

संस्कृति  देशभक्ति का आलाप है, स्थानीय जड़ो की पुस्प्बेल भी है| आत्मनिर्भर भारत के पांच स्तंभों मे सभी स्तंभों मे संस्कृति का पुनरावलोकन करने की आवश्यकता है| हमारे देश में राजस्थान, उत्तर प्रदेश,  दक्षिण भारत के समस्त प्रांतों की अपनी अपनी कालजयी संस्कृतिया है| भारतीय संविधान इन सभी संस्कृतियों को सामासिक रूप में प्रस्तुत करता है| संस्कृति रिन्यूअल करती है -व्यक्ति का, देश का और राष्ट्र का| लोकल टू ग्लोबल तक विस्तार के लिए इसके समय-समय पर नवीनीकरण की आवश्यकता है| भारत में संस्कृति से जुड़ी हुई चाहे संगीत एकेडमी या हो,  चाहे साहित्य अकादमी हो और चाहे  मंत्रालय सब की यह जिम्मेदारी है| स्वयं भी इस कार्य को एक नई ऊर्जा पैदा करने के लिए किया जा सकता हैं| इनोवेशन इसका बीज मंत्र होगा|

कोरोना काल में अवसाद और निराशा थोड़ा बहुत सर्वत्र है ऐसी स्थिति में मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय संस्कृति की जीवंतता और गतिशीलता को नए सिरे से देखने की जरूरत है| इस पर व्यापक बहस और नूतन पक्षों का अन्वेषण एक इंटीग्रेटेड चुनौती और अवसर दोनों ही हैं|

लेखक – विजय ढौंडियाल