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पलायन, गांव वापसी से जुड़े कुछ सुझाव

पलायन

करीब 60, 000 प्रवाशी नौजवान उत्तराखंड के सभी जनपदो मे अपने घर लौटा है| कोरोना काल मे उसकी नौकरियां समाप्त हो गयी| किसी तरह घर वापसी लॉकआउट के दौरान संभव हुई | अब बेरोज़गारी, आर्थिक कठनाई और कही कही सामाजिक असहयोग एवं उलहाने ने उसकी आजीविका को डगमगा दिया है| अब गैंद साशन के पाले मे है| साशन को अतिशीग्र बहुआयामी पहल करनी चाहिए|
इसके अनेक स्वरुप हो सकते है|
बागबानी, गौपालन, एम एस एम ई, इकाइयो पर सर्वाधिक जोर अपेक्षित है|
एक हेल्पलाइन के माध्यम से इन सभी प्रवासियो की दक्षता की स्केलिंग करनी चाहिए|
सिडकुल के माध्यम से औद्योगिक इकाइयो मे रिक्त पदों की स्थिति ज्ञात की जा सकती है| रोजगार मिलने की दशा मे इन्हे कुछ आर्थिक छूट दी जा सकती है|
अब दौर सोशल मीडिया और आईटी का है| इन प्रवास से लौटे बेरोज़गारो को डिजिटल छेत्रो मे एक्सपोज़र दिया जा सकता है| प्रधानमंत्री जी ने टेक्निकल और इनोवेशन ड्रिवन विकास पर जोर दिया है| 2022 तक कृषि आय को दुगना करने का लक्ष्य है| नैनो एग्रीकल्चर मे भी तेजी से आगे बढ़ने की पर्याप्त संभावनाए है|
इन प्रवासी कामगारों को इस समय आजीविका मे स्थिरता देना बहुत जरुरी है, चाहे इसके लिए राज्य को उपलब्ध स्कीमो मे भारी कटौती भी करनी पड़े|
लम्बे समय तक यह कामगार भी थोर ना मिलने की दशा मे वापस महानगरो की और रोजगार की तलाश मे चले जायेंगे| फिर पलायन की त्रासदी और भयावक रूप लेगी|
कहना ना होगा की इन साठ हज़ार से अधिक कामगारो को शीग्र मदद की दरकार है| इसमे समाज, साशन और राज्यव्यवस्था को संवेदनशील तरीके से भाग लेना होगा तभी एक विन-विन सिचुएशन बन सकती है|

लेखक  – विजय ढौंडियाल