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Student Counselling: परीक्षाओ की नीति पर चर्चा

कुछ दिनों पूर्व एक प्रतियोगी संस्था द्वारा मेरा साक्षात्कार प्रकाशित किया गया था|इसके बाद छात्रों की जो प्रतिक्रियाऐ मिली उससे मैं काफी अभिभूत हुआ| मुझे लगा की छात्र छात्राओं को मार्गदर्शन की बहुत आवश्यकता है| मैं इस सम्बन्ध मे निकट भविष्य मे प्रतियोगी परीक्षाओ के सम्बन्ध मे एक व्यापक सीरीज भी शुरू करूँगा| आज का शीर्षक मुझे एक छात्र ने ही दिया है| छात्र प्राय: दुविधा मे रहते है की बी ए, म ए करने के बाद क्या करे| यहाँ इसी मुद्दे को स्पष्ट करने का उद्देश्य है|

प्रतियोगी परीक्षा, विश्वविद्यालय परीक्षा से नितांत भीन्न है| विश्वविद्यालय परीक्षाओ मे जहाँ 5 प्रश्न के उत्तर लिखकर अच्छी श्रेणी लाई जा सकती है वही प्रतियोगी परीक्षा मे प्रश्नों की संख्या इससे दुगनी होती है, प्रश्नों की प्रकृति भी जटिल होती है | सिविल सर्विस परीक्षा का ही उदहारण ले तो यहाँ परीक्षा 3 चरणों मे आयोजित होती है- प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार| यहाँ समय और स्पीड को काफी महत्त्व दिया जाता है| विश्वविद्यालय परीक्षा से भीन्न यहाँ परीक्षा का पाठ्यक्रम भी बहुआयामी होता है| प्रश्नों की प्रकृति भी न केवल जटिल होती है बल्कि उनमे समसामयिकता की भी गुंजाईश रहती है| चाहे एसएससी की परीक्षा हो, सिविल जज, सिविल सर्विसेज सबका कैचमैंट एरिया पूरा भारत रहता है| मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग सभी के छात्र एक सामूहिक परीक्षा देते है| इसके कारण परीक्षा मे दबाब बड़ जाता है| प्रतियोगी परीक्षाओ मे परीक्षा का फॉर्मेट अलग अलग एक्सपर्ट के द्वारा तैयार किया जाता है| यहाँ व्यापक अध्ययन और वर्षो की तैयारी काम आती है|

अब कोचिंग संस्थानो के प्रत्यक्ष टीचिंग के बजाय ऑनलाइन शिक्षा जोर पकड़ रही है| ऐसी स्थिति मे प्रतियोगी परीक्षाओ मे और बदलाव होने संभावित है| अखिल भारतीय परीक्षाओ मे लेखन और अभ्यास की बड़ी भूमिका है|नोट्स तो घरेलु परीक्षाओ मे भी तैयार किये जाते है किन्तु प्रतोयोगी परीक्षाएं अपने विषय, स्वरुप व राणनीति के कारण इससे बहुत आगे है|छात्र छात्राओं को योग्य मार्गदर्शन की आवश्यकता है| इस दिशा मे कुछ आगामी परीक्षाओ के विषय वस्तु, लेखन कला और रणनीति के बारे मे प्रयास किये जायेंगे| छात्र समुदाय चाहे तो अपने प्रश्न भी भेज सकता है|

लेखक – विजय ढौंडियाल आईएएस (RETD)

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