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वृद्धो की अनसुनी कहानी : back to parents

वृद्धो की अनसुनी कहानी

मेरे जेहन मे 2 ताजी यादे है|
मेरे पड़ोस के एक युवक के पिता की देहरादून मे मौत हो गई| लड़का अमेरिका मे जॉब पर था| मेरे एक मित्र ने पुत्र को अमेरिका मे सूचना दी किन्तु उसने कड़कती अंग्रेजी मे उत्तर दिया की उनकी अंतिम रसम कर दे और जो खर्च आएगा वह मुझे बता दे| मैं अभी नहीं आ सकता पर पैसे भेज दूंगा | मोहल्ले वालो ने मिल कर बुजुर्ग का अंतिम संस्कार किया|
मेरी रिश्तेदारी मे एक परिवार है| परंपरा मे ढला हुआ सोच वाला परिवार| इस परिवार मे माँ का निधन हो गया लड़का अमेरिका मे पढ़ रहा है| परम्पराओ के अनुसार छोटा बेटा माँ की चिता को अग्नि देता है| पिता ने सूचित किया तो लड़के ने तड़ाक से कह दिया की आगामी दिवाली तक घर नही आ पायेगा| अंतिम संस्कार बिना बेटे के ही करना पड़ा|

उपरोक्त दोनो मर्म स्पर्शी कहानियाँ हमारे समाज मे वृद्धो की ऐसी अनकही कहानियाँ है जिसमे उनका बुढ़ापा अकेले पन मे बीतता है|दवा दारू, खाना पीना और खराब सेहत को धोते धोते वह अचानक दुनिया को अलविदा कह जाते है| मध्यमवर्गीय परिवारों मे यह त्रासदी और भी बुरी है|औलादो से कभी कभार संवाद मोबाइल पर हो जाता है किन्तु रिश्तो की ऊष्मा कब की गायब हो चुकी है| देहरादून और पूना को सेवानृवित लोगो का शेहर कहा जाता है| यहाँ बड़े बड़े घरों मे यह वृद्ध अकेले ही जिंदगी की जंग लड़ते है| पश्चिम देशो की तरह यहाँ वृद्धा आश्रम नही है और ना मध्यवर्गीय बुजुर्गो मे इनमे रहने का संस्कार ही है| कदाचित हमारे गांव मे तोह यह स्थिति और भी खराब है| भारतीय संस्कृति और दर्शन मे मोक्ष का पूरा कर्मकांड है किन्तु अब परम्पराये रिस रही है| संस्कारो को विदेशपरस्त युवा पीढ़ी धार्मिक बकवास समझती है|
यह सही है की वैश्वीकरण और उदारीकरण ने युवाओं के लिए विदेशो मे नौकरियों के अच्छे अवसर जुटाए है| आज देश दुनिया के तमाम मुल्को मे वायुसेवा द्वारा शीग्र पंहुचा जा सकता है| वैश्वीकरण ने सीमाओं के बहार नौकरियों का नया संसार बसाया है किन्तु पश्चिम की भोगवादी संस्कृति के अनुरूप इसने माध्य वर्गीय समाजो की कोमल संवेदनाओ मे भी छेद कर दिए है| पच्छिम की रीती नीति की चाह ने पूरब की संस्कार चेतना, पारम्परिक परिवार बोध और अन्योन्याश्रय की रीती को तहस नहस कर दिया है | इसी का परिणाम है उपरोक्त दोनो कहानियाँ| क्या हम आज भी सचेत हो सकते है| सुखद है कि कोरोनावायरस के इस दौर में माता-पिता की छतरी और गोद फिर याद आने लगी है| उम्मीद है कि विदेशोंं में नौकरी पर गए युवा ऊंची पगारो के बाद भी रिश्तो की मिठास को नवजीवन देंगे|
वृद्धो की संवेदना और मानसिक कष्ट को समझना होगा| उन्होंने हमे जीवन भर भरपूर प्यार दिया अब हमे भी बदले हालातो मे उनकी खोज खबर लेनी चाहिए, उन्हें अपने साथ रखना चाहिए और उचित सत्कार देना चाहिए|
सन्देश स्पष्ट है- बैक तू पेरेंट्स|

लेखक – विजय कुमार