केंद्र सरकार ने 2027 की जनगणना के लिए अधिसूचना जारी कर दी है, जिसके बाद उत्तराखंड में तैयारियां तेज हो गई हैं। जनगणना पूरी होने तक राज्य की प्रशासनिक और भौगोलिक सीमाएं स्थिर रहेंगी, यानी कोई बदलाव नहीं होगा। आंकड़ों की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए यह प्रावधान लागू किया गया है। उत्तराखंड में भौगोलिक चुनौतियों के कारण जनगणना तीन चरणों में 2026-2027 तक पूरी होगी, जिसमें प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शामिल है।
देश की सबसे व्यापक प्रशासनिक कवायद मानी जाने वाली जनगणना की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो गई है।
केंद्र सरकार के वर्ष 2027 की जनगणना के लिए आवास सूचीकरण और आवासीय संबंधी अधिसूचना जारी करते ही उत्तराखंड में भी तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
अधिसूचना के साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रविधान स्वत: लागू हो गया है, जिसके तहत जनगणना पूर्ण होने तक राज्य की प्रशासनिक और भौगोलिक सीमाएं स्थिर मानी जाएंगी।
इसका अर्थ है कि अब किसी भी जिले, तहसील, नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, ग्राम पंचायत या वार्ड की सीमाओं में बदलाव नहीं किया जा सकेगा और न ही नए निकायों का गठन होगा। यह व्यवस्था आंकड़ों की शुद्धता और तुलनात्मक विश्लेषण को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू की गई है।
उत्तराखंड की भौगोलिक विषमताओं, विशेषकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बर्फबारी को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग समय-सीमाएं तय की गई हैं।
इसके तहत राज्य में जनगणना का कार्य तीन चरणों में संपन्न किया जाएगा। पहला चरण 25 अप्रैल से 24 मई, 2026 तक चलेगा, जिसमें अधिकांश मैदानी और सुलभ क्षेत्रों में मकान सूचीकरण और परिवारों का विवरण संकलित किया जाएगा।
दूसरा चरण 11 से 30 सितंबर, 2026 तक उन दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में चलेगा, जहां सामान्य मौसम में पहुंचना कठिन रहता है।
तीसरा और अंतिम चरण नौ से 28 फरवरी, 2027 तक संचालित कर शेष कार्य पूरा किया जाएगा। आवासीय गणना के लिए 16 फरवरी से बहुस्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आरंभ होगा।
पहले मास्टर ट्रेनर प्रशिक्षित किए जाएंगे, जो आगे फील्ड ट्रेनर और सुपरवाइजर को प्रशिक्षित करेंगे। ये सुपरवाइजर जमीनी स्तर पर गणना कार्य की निगरानी करेंगे।

