अल्मोड़ा के शीतलाखेत क्षेत्र में असामाजिक तत्वों ने जंगलों में आठ जगहों पर आग लगा दी, जिससे ग्रामीणों द्वारा एकत्र किए गए पीरूल के दो बड़े ढेर जलकर खाक हो गए। इस घटना ने मानवीय लापरवाही और शरारती तत्वों की भूमिका को उजागर किया है, जिससे वन संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचा है और ग्रामीणों ने दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
वनाग्नि की घटनाओं को लेकर अक्सर चीड़ के पेड़ों और पीरूल को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन शीतलाखेत क्षेत्र में हुई ताजा घटना ने एक बार फिर मानवीय लापरवाही और शरारती तत्वों की भूमिका को उजागर कर दिया है।
बीती रात कुछ असामाजिक तत्वों ने शीतलाखेत-खूंट-कोसी मोटर मार्ग के आसपास जंगलों में अलग-अलग आठ स्थानों पर आग लगा दी, जिससे क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
घटना में चंपाखाली और नौला क्षेत्र में ग्रामीणों द्वारा एकत्र किए गए पीरूल के दो बड़े ढेर भी आग की भेंट चढ़ गए।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार जंगलों को आग से बचाने के उद्देश्य से ग्रामीणों से 10 रुपये प्रति किलो की दर से पीरूल खरीदने की योजना संचालित कर रही है। इसके तहत ग्रामीण बड़ी मेहनत से जंगलों से पीरूल एकत्र कर रहे हैं, लेकिन आगजनी की इस घटना ने उनके प्रयासों पर पानी फेर दिया।
सामाजिक कार्यकर्ता गजेंद्र पाठक ने घटना पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग के पीछे प्राकृतिक कारणों से अधिक मानवीय चूक, ईर्ष्या और स्वार्थ जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने पीरूल के ढेरों को आग के हवाले किया, उन्होंने न केवल ग्रामीणों की मेहनत को नुकसान पहुंचाया बल्कि वन संरक्षण के प्रयासों को भी कमजोर किया है।

